शनि जयंती (Shani Jayanti)

Shani Jayanti

शनि हमारी कुंडली में मौजूदा नवग्रहों में से एक हैं। इन्हें देव स्वरूप अर्थात भगवान की उपाधि दी गई है। किसी भी जातक की कुंडली में शनि देव की प्रकृति, दशा-दिशा आदि का ठीक होना अत्यंत ही आवश्यक होता है। शनि के असंतुलित अथवा वक्र दृष्टि (शनि की ढैय्या) के नाम से ही लोगों में भय छा जाता है। किसी भी जातक की कुंडली में शनि की मौजूदा स्थिति उसके भूत, भविष्य एवं वर्तमान को प्रदर्शित करती हैं।

हमें सदैव यही लगता है कि शनि हमेशा जातकों के प्रति अपनी बुरी दृष्टि रखते हैं, किंतु ऐसा नहीं है। शनि को न्याय का देवता माना जाता है। यह कर्मों के अनुरूप व्यक्ति को परिणाम प्रदान करते हैं। शनि अत्यंत ही तीव्र प्रभावी देव हैं। इनका जन्म भगवान सूर्य एवं माता संध्या के सहयोग से हुआ है। शास्त्रों में ऐसा निहित है कि जिस भी जातक पर शनि अपना दुष्प्रभाव दिखाते हैं, वह व्यक्ति भुखमरी, कष्ट, पीड़ा, बीमारी आर्थिक समस्याओं आदि से ग्रसित हो जाता है। ऐसे जातकों को भगवान शनि को प्रसन्न करने हेतु जतन करने की आवश्यकता होती है। ऐसे जातक प्रत्येक शनिवार, शनि अमावस्या एवं शनि जयंती के दिन भगवान शनि की विशेष विधि विधान से पूजन कर्म करें।

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आइए आज हम जानते हैं इस वर्ष शनि जयंती हेतु कथा, पूजन कर्म एवं शुभ मुहूर्त-

शनिदेव की जन्मकथा

भगवान शनि देव के संबंध में ग्रंथ आदि में यह निहित है कि शनि देव भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। दरअसल भगवान सूर्य का विवाह संध्या देवी से हुआ था। संध्या देवी भगवान सूर्य के साथ अत्यंत सुखी थी किंतु वह अपनी प्रकृति के अनुरूप सूर्य के तेज को सहन कर पाने में स्वयं को असमर्थ महसूस करती थी। हालांकि भगवान सूर्य और देवी संध्या के प्रेम एवं संयोग से उनकी तीन संताने मनु, यमुना और यम की प्राप्ति हुई, किंतु देवी संध्या भगवान सूर्य के तेज को और अधिक सहन नहीं कर पा रही थी जिस कारण उन्होंने अपने स्थान पर अपनी छाया को भगवान सूर्य के रख-रखाव एवं सेवा हेतु छोड़ दिया और वे महल से चली गई। कुछ समय पश्चात भगवान सूर्य और छाया माता से एक संतान की उत्पत्ति हुई जिसका नाम शनि रखा गया जिस कारण शनिदेव सूर्य एवं छाया के पुत्र कहलाए।

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वर्ष 2020 शनि जयंती तिथि व मुहूर्त

भगवान शनि का जन्म जेष्ठ मास की अमावस्या तिथि को भगवान सूर्य एवं देवी संध्या से हुआ है। भगवान शनि न्याय के देवता हैं। यह अत्यंत ही प्रतापी हैं और व्यक्ति को उनके कर्म का उचित परिणाम अथवा दुष्कर्म का दंड प्रदान करते हैं। भगवान शनि की जन्म तिथि को हर वर्ष शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष 22 मई दिन शुक्रवार को पंचांग तिथि के अनुरूप जेष्ठ मास की अमावस्या तिथि पड़ रही है। अतः आइए जानते हैं इस वर्ष भगवान शनि के पूजन कर्म हेतु अमावस्या तिथि के आरंभ व अंत का मुहूर्त -

अमावस्या तिथि आरंभ:- 21 मई 2020 को रात्रि 9 बजकर 35 मिनट पर।
अमावस्या तिथि समापन:- 22 मई 2020 रात्रि 11 बजकर 7 मिनट पर।

शनि को संतुलित करने के हेतु मंत्रों से जुड़े उपाय

शनि को प्रसन्न करने हेतु मंत्र एवं उपाय निम्नलिखित हैं:

प्रत्येक शनिवार को स्नान पूजन कर्म आदि करने के पश्चात भगवान शनि के समक्ष इस मंत्र का द्वारा उनका आवाहन करें एवं मन ही मन उनसे सुख-शांति एवं समृद्धि द्वारा अपनी कृपा दृष्टि बनाने की बनाए रखने हेतु प्रार्थना करें।

नीलाम्बरः शूलधरः किरीटी गृध्रस्थित स्त्रस्करो धनुष्टमान्। चतुर्भुजः सूर्य सुतः प्रशान्तः सदास्तु मह्यां वरदोल्पगामी।।

पूजन कर्म के आरंभ अथवा अंत में इस मंत्र द्वारा भगवान शनि से अपने प्रणाम को स्वीकार करने हेतु आग्रह करें।

शनि नमस्कार मंत्र :

ॐ नीलांजनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

शनिदेव को प्रसन्न करने एवं उनके कृपा पात्र बनने हेतु नियमित तौर पर इस मंत्र का जप करें।

ॐ शं शनैश्चराय नमः"।।

अगर आपके ऊपर साढ़ेसाती चल रहा हो तो भगवान शनि को प्रसन्न कर उनके कृपा पात्र बनने हेतु आप हर शनिवार को पीपल के वृक्ष के चारों ओर 7 बार कलावा बांधते हुए भगवान शनि के मंत्र 'ॐ शं शनैश्चराय नमः।।' का मन ही मन जप करें। संध्याकाल में शनि के मंत्र का जप करते हुए पीपल के वृक्ष के समक्ष तिल के तेल से दीपक जलाएं।

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