गंगा दशहरा (Ganga Dussehra)

Ganga Dussehra (Avtaran)

गंगा दशहरा हर वर्ष माँ गंगा के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह हर वर्ष ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथी को मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। गंगा हिमालय से निकलते हुए मुख्यतः हरिद्वार, वाराणसी, बनारस, इलाहाबाद, ऋषिकेश आदि स्थानों पर पूजनीय स्वरूप में अवस्थित है। यह महोत्सव 10 दिनों तक चलता रहता है। माना जाता है कि इस दिन गंगा में गोता लगाने से 10 प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। तो आइये जानते है इस पर्व के पीछे की कथा तिथि, मंत्र एवं शुभ मुहूर्त आदि को।

गंगा अवतरण 2020 शुभ मुहूर्त

गंगा दशहरा: 1 जून 2020, दिन सोमवार

दशमी तिथि प्रारम्भ: मई 31, 2020 शाम 05 बनकर 36 मिनट से।
दशमी तिथि का समापन: जून 01, 2020 को दोपहर 02 बजकर 57 मिनट पर

हस्त नक्षत्र प्रारम्भ: जून 01, 2020 को सुबह 03 बजकर 01 मिनट से
हस्त नक्षत्र का समापन: जून 02, 2020 को सुबह 01 बजकर 03 मिनट पर (01:03am)।

व्यतीपात योग प्रारम्भ: जून 01, 2020 को प्रातः 01:18 बजे से
व्यतीपात योग समाप्त: जून 02, 2020 को रात्रि 09:53 बजे

गंगा जी की कथा

बात त्रेता युग से भी पूर्ण आदिकाल की है जब अयोध्या पर राजा सगर का राज हुआ करता था। महाराज सगर की दो पत्नियां थी जिनमें से एक के 60000 पुत्र एवं दूसरी का केवल एक ही पुत्र था।

एक बार की बात है महाराज सगर ने अपने राज्य की सुख, शांति एवं समृद्धि हेतु अश्वमेघ यज्ञ कराने का विचार किया जिसमें यज्ञ की विधि अनुसार अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को राज्य के बाहर छोड़ दिया गया। राजा इंद्र इसी ताक में थे कि कोई ऐसा अवसर प्राप्त हो जिससे इस यज्ञ को असफल बनाया जा सके। अतएव मौका मिलते ही उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को चुराकर दूर महर्षि कपिल के आश्रम में जाकर छिपा दिया। महर्षि कपिल उत्कृष्ट तपस्वी व्यक्ति थे जो पाताल लोक में प्रवास कर तपस्या करते थे।

घोड़े के बहुत खोजने पर भी ना मिलने पर महाराज सगर चिंतित हो गए एवं उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया। ढूंढते-ढूंढते महाराज सगर के साठ हजार पुत्र खुदाई करते हुए पाताल लोक में महर्षि कपिल के आश्रम जा पहुंचे एवं महर्षि कपिल के समक्ष अपने घोड़े को देखकर उन्हें चोर संबोधित कर चीखने लगे। इस पर ऋषि कपिल ने क्रोध के आवेश में आकर अपने नेत्र खोलें जिससे सगर के 60000 पुत्र तत्काल भस्म हो गए।

इस घटना के बाद सभी मृत आत्माओं की मुक्ति हेतु राजा सगर, तत्पश्चात अंशुमान दिलीप आदि सभी घोर तपस्या करते हैं एवं भूलोक पर मां गंगा के अवतरण हेतु ईश्वर से गुहार लगाते हैं। किंतु उनकी तपस्या असफल रह जाती है और वे मृत्यु के आगोश में समा जाते हैं। दरअसल गंगा के अवतरण के पीछे का तथ्य यह था कि हिन्दू धर्म मे किसी भी व्यक्ति के मोक्ष हेतु तर्पण का विधान है जिसके लिए नदियों में अस्थि विसर्जन को अहम माना जाता है। किंतु हुआ ऐसा था कि  महर्षि अगस्त्य ने संपूर्ण सृष्टि की पवित्र नदियों के जल का पान कर लिया था जिस वजह से सगर के पुत्रों के तर्पण का कर्म अधूरा था।

सगर के कई वंशज ईश्वर को प्रसन्न कर माँ गंगा की कामना कर रहे थे। इसी क्रम में महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ ने घोर तपस्या कर ब्रह्म देव को प्रसन्न किया एवं माँ गंगा के सानिध्य की इच्छा प्रकट की जिस पर ब्रह्मदेव ने कहा - मैं गंगा के धरा पर अवतरण की अनुमति तो तुम्हें दे दूंगा, किंतु पृथ्वी, गंगा के वेग को सहन कर पाने में सक्षम नहीं है। अतः तुम्हें सर्वप्रथम भगवान शिव का शरणागत होना होगा। तत्पश्चात भगीरथ ने एक टांग पर खड़े होकर भगवान शिव की तपस्या की एवं उन्हें प्रसन्न किया जिस पर भगवान शिव ने सभी समस्याओं का निदान करते हुए पृथ्वी पर गंगा के अवतरण का वचन दिया। अतएव जिस दिन मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण होता है वह दिन ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी। उस दिन से इस तिथि को हर वर्ष गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाने लगा।

गंगा स्नान का महत्त्व

गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। आज के दिन गंगा में गोते लगाना मोक्ष के द्वार खोलता है। यदि गंगा में स्नान संभव ना हो तो आप समीप के किसी पवित्र नदी में स्नान करें अथवा घर में स्नान करने के जल में गंगाजल को मिश्रित कर, शुद्ध भाव के साथ इस मंत्र का मन ही मन जप उच्चारण करें।

नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:'

इस मंत्र के पश्चात निम्नलिखित मंत्र का भी उच्चारण करें।

ऊं नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा

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