वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat)

Vat Savitri Vrat

किसी भी सुहागन स्त्री के लिए उसके पति ही सर्वस्य होते हैं। वे उन्हीं में देवत्व को अनुभव करती हैं। अपने पति की सेवा आराधना को ही वो अपना धर्म मानती हैं। एक स्त्री अपने पति की लंबी उम्र हेतु अनेकानेक व्रत उपवास आदि भी करती हैं जिनमें से वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। वट सावित्री एक ऐसा व्रत है जिसमें एक पत्नी अपने पति के प्राण हेतु यमराज तक से लड़ जाती हैं। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत के पीछे की कथा, इस वर्ष इसके शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि विधान-

वट सावित्री व्रत-कथा

सावित्री को आदि काल से ही गायत्री के एक स्वरूप के रूप में पूजा जाता रहा है। बात लंबे अरसे पूर्व की है जब एक बार मद्र प्रदेश के राजा अश्वपति ने देवी सावित्री के अपने गृह में आगमन हेतु अपनी अर्धांगिनी के साथ विधिवत तौर पर देवी सावित्री का व्रत धारण कर पूजन अर्चन का कर्म सम्पन्न किया। तत्पश्चात देवी सावित्री उनके घर अश्वपति की पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं। देवी सावित्री बचपन से ही अत्यंत ही सुंदर एवं गुणवान थी, अतः उसके युवा होने पर अश्वपति ने देवी सावित्री को अपने मंत्री के साथ स्वयं हेतु योग्य वर के चयन हेतु भ्रमण पर भेज दिया।

देवी सावित्री जब अपने लिए सुयोग्य वर ढूंढ कर घर लौटती हैं तब महर्षि नारद उनके घर पधारते हैं। महर्षि नारद द्वारा वर के संबंध में पूछने पर देवी सावित्री ने महाराज द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का नाम बताया। सत्यवान के पिता द्युमत्सेन नेत्रहीन थे और वे अपनी पत्नियों के साथ वन में वास करने लगे थे। उनका राज्य तक हड़प लिया गया था। वहीं दूसरी ओर उनका इकलौता पुत्र सत्यवान अत्यंत ही गुणवान कीर्तिमान एवं यसस्वी था। सावित्री ने अपने जीवनसाथी के रूप में सत्यवान को चुना। नारद जी यह सुनकर प्रसन्न हो गए। वे सत्यवान की प्रशंसा करने लगें। उन्होंने अश्वपति को शुभकामनाएं दी और कहा की पुत्री सावित्री ने अत्यंत योग्य वर का चयन किया है। इसके बाद उन्होंने सावित्री एवं सत्यवान की कुंडली मिलाना आरंभ किया जिसमें ग्रह गोचर की स्थिति के अनुसार विवाह के कुछ ही वर्षों के पश्चात सावित्री के पति यानी सत्यवान की मृत्यु तिथि निर्धारित थी। नारद मुनि द्वारा यह बात सुनकर अश्वपति हताश हो गए। उन्होंने अपनी पुत्री से किसी अन्य वर के चयन हेतु सलाह दिया, किंतु सावित्री ने अपने पिता के परामर्श को ठुकराते हुए उत्तर दिया कि पिताजी मैं एक आर्य कन्या हूं, आर्य कन्या जब किसी को अपने वर के रूप में चयन करती है तब वो उसी वक्त से उसे अपना स्वामी मान बैठती है। मैंने सत्यवान का अपने पति के रूप में वरण किया है। अतः अब चाहे परिस्थितियां जो भी हो, सत्यवान अल्पायु हो दीर्घायु हो सुंदर या कुरूप, जो भी कुछ हो, मैंने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया है जिसे अपने आखरी सांस तक बनाये रखूंगी।

पुत्री की जिद के समक्ष पिता नतमस्तक हो जाते हैं और फिर उन्होंने सावित्री सत्यवान का विधिवत तौर पर विवाह करा देते हैं  जिसके बाद सावित्री अपनी सास एवं ससुर के साथ वन में रहने लगती है। सावित्री ने महर्षि नारद से विवाह पूर्व ही सत्यवान की मृत्यु तिथि, समय, निर्धारित स्थल आदि के संबंध में पूरी जानकारी ले ली थी। विधि के विधान अनुसार निर्धारित तिथि को सत्यवान का काल उसके सिर पर मंडरा रहा था किंतु सावित्री का पतिव्रता सत्यवान कवच उसके साथ चल रहा थी। नारद जी द्वारा बताये गई नुस्खे के अनुसार देवी सावित्री ने सत्यवान की मृत्यु की निर्धारित तिथि के 3 दिन पूर्व से ही उपवास आरंभ कर दिया था।

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सत्यवान की मृत्यु हेतु निर्धारित तिथि का दिन आया। सत्यवान वन में जब पेड़ काटने से लकड़ियां काटने जाते हैं तब उनके साथ में सावित्री भी वन जाती हैं। इसी दौरान सत्यवान को एक विषैले सर्प ने डस लिया और वह पेड़ से मूर्छित होकर नीचे गिर जाते हैं। वह पेड़ वट का था। तत्पश्चात यमराज उनके प्राण हरण हेतु सत्यवान के समीप आते हैं। सत्यवान के प्राण हरण पश्चात सावित्री भी उनके पीछे पीछे चल देती है। सावित्री गायत्री उपासक थी एवं गायत्री के अनेकानेक रूपों में से एक थी। इस कारण यमराज देवी सावित्री के समक्ष हाथ जोड़कर नम्र भाव से विनती करते हैं कि वे उनके पीछे ना आए किंतु देवी सावित्री कहती हैं कि किसी भी सुहागन स्त्री के लिए उनके पति सर्वस्य होते हैं। अतः वे जहां रहेंगे, उनकी पत्नी उनके साथ आएंगी ही। यही पतिव्रता नारी का धर्म है।

यमराज सावित्री के विचारों से प्रसन्न होकर कहते हैं -देवी मैं आपको वर देना चाहता हूँ, आप जो चाहे वर मांगे। अपने पति के प्राणों को छोड़कर आप जो कुछ भी मांगेंगी, मैं उसे अवश्य ही पूर्ण करूंगा। तब सावित्री ने अपनी बुद्धिमता का प्रयोग किया एवं यमराज से यह वर मांगा कि उसके सास-ससुर अपने पौत्र को सोने की कटोरी में खीर खिलाएं। इस वर के माध्यम से सावित्री ने अपने सास-ससुर के नेत्र, पति का जीवन, अपने लिए पुत्र एवं धन संपदा आदि सभी की मांग कर ली। यमराज अपनी बात से मुकर ना पाए और उन्हें विवश होकर देवी सावित्री को यह वर देना ही पड़ा। यमराज देवी सावित्री की बुद्धिमता से अत्यंत ही प्रभावित हुए और उन्हें आजीवन सुहागन रहने का वरदान भी दीया। साथ में यह भी कहा कि देवी आज आपने अपने पति के प्राणों की यम से रक्षा की है, अतः आज से जो भी सुहागन स्त्री विधिवत तौर पर इस दिन व्रत उपवास रखकर अपने पति के पति के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त करेंगी, मैं उनका बाल भी बांका नहीं करूंगा। यह तिथि जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अमावस्या की थी। तब से हर वर्ष जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अमावस्या तिथि को इसे वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाने लगा।

वट सावित्री व्रत 2020 हेतु तिथि व शुभ मुहूर्त -

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अभिन्न अंग हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को वट सावित्री व्रत पर विधिवत तौर पर व्रत पूजन आदि करना सुहागन स्त्रियों के लिए वरदान स्वरूप है। इसकी चर्चा स्कंध एवं भविष्योत्तर पुराण में भी की गई है। इस वर्ष 2020 में वट सावित्री व्रत की तिथि 22 मई 2020 अमावस्या की है जिसमें अमावस्या की तिथि 1 दिन पूर्व ही 21 मई 2020 की संध्या 09 बजकर 35 मिनट से आरंभ हो जाएगी जो 22 मई 2020 की रात्रि 11 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगी। अतः मुहूर्त को ध्यान में रखते हुए 1 दिन पूर्व से ही अमावस्या के आरंभ होने के पश्चात अन्न जल ग्रहण ना करें एवं विधिवत तौर पर श्रद्धा भाव के साथ अपने पति के प्रति प्रेम रखते हुए व्रत को पूर्ण करें।

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व्रत-पूजन सामग्री

व्रत के पूजन हेतु 1 दिन पूर्व से ही सामग्री तैयार की जाती है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, मिट्टी से बनी देवी सावित्री, उसके पति सत्यवान एवं यमराज की मूर्ति को पूजन से पूर्व स्थापित करना चाहिए। किसी पवित्र स्थल पर स्थित वट के वृक्ष के इर्द-गिर्द की साफ सफाई कर पूजन हेतु वट वृक्ष का चयन कर लेना चाहिए। पूजन कर्म में षोडशोपचार पूजन के सभी तत्व जैसे अक्षत, पुष्प, पान, सुपारी, धूप, दीप, नैवेद्य आदि रखना चाहिए। इन सब में सबसे अहम कलावा यानी रक्षा सूत्र को माना जाता है, इसे अवश्य ही लेना चाहिए। साथ ही एक घी का दिया भी तैयार कर लें।

पूजन विधि

वट सावित्री व्रत के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान कर, शुद्ध भाव से निर्जला व्रत रखें एवं अपने घर के इष्ट आदि का पूजन कर किसी वट वृक्ष के समीप जाकर आसपास की स्वच्छता बनाए। तत्पश्चात वटवृक्ष में जल अर्पित करें। फिर षोडशोपचार पूजन कर्म का समापन करें। भिन्न-भिन्न प्रकार के मौसमी फलों का भोग लगाकर प्रसाद बांटे। आज के दिन रक्षा सूत्र द्वारा वटवृक्ष के चारों और परिक्रमा करते हुए कम से कम 7 बार रक्षा सूत्र से वृक्ष को बांधते हुए अपने पति के प्राणों की रक्षा हेतु कामना करना चाहिए। साथ ही पति को दिए गए सभी सात वचनों का निष्ठा से निर्वहन की कामना करनी चाहिए।