वास्तु के अनुसार कैसा हो आपका पूजा घर

Puja Ghar Vastu Tips

वास्तु शास्त्र वास्तव में प्राचीन भारत में घर, मंदिर, महल आदि बनाने की विशेष कला का नाम है। इसके अनुसार ब्रह्मांड की सभी चीजों में ऊर्जा का एक स्तर है जो उनके साथ जुड़ा हुआ है। अर्थात सभी इमारतें और यहां तक कि जिस जमीन पर इमारत खड़ी की जाती है, उसमें भी ऊर्जा पाई जाती है। इसके अनुसार यह कहना उचित होगा कि हम लगातार 24 × 7 ऊर्जा के साथ ही रह रहे हैं। इनमे से कुछ ऊर्जा सकारात्मक (मनभावन प्रभावों के साथ) हैं, जबकि अन्य नकारात्मक (भयानक प्रभाव वाले) हैं। वास्तु का उद्देश्य किसी स्थान या स्थान पर मौजूद नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करना और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है ताकि व्यक्ति, परिवार या किसी व्यवसाय में रहने वाले व्यक्ति भी समृद्ध और प्रगतिशील बन सकें।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, विभिन्न दिशाएं अलग-अलग भगवानों को सुपुर्द होती हैं जो घर के संबंधित क्षेत्रों की देखरेख करते हैं। उदाहरणतः ईश्वर ईशान या उत्तर-पूर्व दिशा की देखरेख करते हैं और इसलिए प्रार्थना कक्ष के लिए सबसे उपयुक्त है; अग्नि (अग्नि तत्व) दक्षिण-पूर्व दिशा की देखरेख करता है और इसलिए रसोई के लिए सबसे उपयुक्त है, आदि। अतः अगर घर, कार्यालय, दुकान आदि के प्रत्येक खंड से संबंधित विभिन्न खंड और गतिविधियां, वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों से संलगनित रहते हैं, जिससे हम प्रकृति की शक्ति को आसानी से सहज सकते है और अपना लक्ष्य बिन बाधा प्राप्त कर सकते है।

पूजा कक्ष और वास्तु का सम्बन्ध

वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा कक्ष बेहतर स्वास्थ्य, परिवार के सदस्यों के बीच अच्छा तालमेल और शांतिपूर्ण जीवन के लिए ''सहस्र चक्र'' और ज्ञान एवं बुद्धि के विकास हेतु "आज्ञा चक्र" को सक्रिय करने में मदद करता है। आपके घर में सबसे पवित्र और शुभ स्थान आपका पूजा कक्ष या प्रार्थना कक्ष होता है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ आकर कोई भी मनुष्य मन की शांति पा सकता है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। इसलिए इस शुभ स्थान के आसपास किसी भी प्रकार की नकारात्मकता हमारे स्वास्थ्य, भाग्य, समृद्धि और सफलता को प्रभावित कर सकती है।

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पूजा कक्ष के लिए वास्तु शास्त्र में मूर्तियों की नियुक्ति, पूजा स्थल की दिशा और पूजा कक्ष में रखी जाने वाली विभिन्न वस्तुओं को शामिल किया जाता है। पूजा कक्ष के लिए वास्तु उसमे प्रवेश होने वाली नकारात्मक ऊर्जाओं को साफ करता है और सकारात्मक ऊर्जाओं को बढ़ाता है। पूजा कक्ष उन कई चीजों में से एक है जिन्हें वास्तु का अत्यधिक ध्यान रखना चाहिए क्योंकि यह सकारात्मक ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों में से एक है। इस कक्ष में वास्तु का सही स्थान न केवल घर में सकारात्मकता लाता है, बल्कि ध्यान और आराम करने में भी मदद करता है।

पूजा कक्ष के लिए प्रभावी वास्तु टिप्स

  • पूजा कक्ष में छत का आकार गुंबद या पिरामिड के आकर का होना चाहिए ताकि वहां ब्रह्मांडीय ऊर्जा समान रूप से वितरित हो सके।
  • पूजा कक्ष को अपने बेडरूम या अपने बेडरूम से लगी दीवार पर नहीं रखना चाहिए।
  • पूजा कक्ष बाथरूम और शौचालय से सटा हुआ नहीं होना चाहिए।
  • पूजा कक्ष बाथरूम या शौचालय के नीचे नहीं होना चाहिए।
  • पूजा कक्ष के अंदर या आस-पास किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं रखनी चाहिए।
  • भगवान की टूटी हुई मूर्तियों या चित्रों को कभी न रखें उसे विसर्जित कर दें।
  • मूर्तियों को फर्श पर नहीं रखना चाहिए, इसके बजाय मूर्ति को एक मंच या आसानी पर रखना चाहिए।
  • पूजा घर में दो शिवलिंग की स्थापना नहीं करनी चाहिए।
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  • तीन गणेश जी या दुर्गा माँ की मूर्ति का होना भी शुभ नहीं माना जाता है।
  • दो शंख, दो सूर्य-प्रतिमा, दो द्वारका के (गोमती) चक्र और दो शालिग्राम आदि का पूजन नहीं करना चाहिए , इससे घर में अशांति आती है।
  • पूर्व या उत्तर की दीवार पर कुल देवता का चित्र लगाना शुभ होता है।
  • पूजा घर का मुख दक्षिण या पश्चिम दिश में होना चाहिए।
  • उत्तर दिशा में बना पूजा घर सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत होता है।
  • पूजास्थल में स्थापित मूर्ति को नैऋत्‍य कोण में ना रखें।

पूजा कक्ष के वास्तु के लिए सामान्य मिथ्या:

पूजा घर के वास्तु से सम्बंधित कुछ मिथ्या कथन, जो लोगों ने सुनी-सुनाई बातों पर बनायें है, निम्न है:

  • पूजा कक्ष में मूर्तियों की स्थापना की जगह चित्र को स्थापित करना चाहिए।
  • पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करनी चाहिए।
  • घर में स्थापना हेतु मूर्ति की ऊँचाई निश्चित माप से अधिक नहीं होनी चाहिए
  • दक्षिण दिशा में अग्निकुंड की स्थापना होनी चाहिए
  • पूजा कक्ष पीला या सफेद रंग का होना चाहिए
  • कारखानों में पूजाघर की स्थापना उसके केंद्र में होनी चाहिए


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