महा शिवरात्रि

Maha Shivratri

प्रत्येक वर्ष महा शिवरात्रि का त्योहार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव एवं उनकी अर्धांगिनी देवी पार्वती की विशेष पूजा-आराधना एवं व्रत भी किया जाता है।

शिवरात्रि पर पूरे दिन व्रत रखने का विधान है। इस दिन भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है साथ ही चारों प्रहर में विशेष मंत्रो से इनकी पूजा की जाती है।

शिवरात्रि की रात्रि को बड़े-बड़े मंदिरों एवं शिवालयों में शिव एवं देवी पार्वती का विधि-विधान से विवाह सम्पन्न कराया जाता है। हिन्दू धर्म में इस त्योहार का विशेष महत्व है। विधिवत रूप से शिवरात्रि का व्रत धारण करने से कुँवारी कन्याओं को शंकर जी से सामान सुंदर एवं आकर्षक स्वरूप वाले प्रेम करने वाले वर की प्राप्ति होती है। वहीं इस व्रत के धारण करने से व्यक्ति के सभी द्वेष भाव दूर होते है एवं अंतःकरण की दिव्य दृष्टि खुलती है, साथ ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

महाशिवरात्रि व्रतकथा

प्राचीन काल में वाराणसी के घने जंगल में एक गुरुद्रुह नामक शिकारी रहता था जिसका मुख्य पेशा जानवरों का शिकार कर अपना एवं अपने परिवार के सभी जनों का पेट भरना था।

एक बार की बात है, शिवरात्रि के दिन वो शिकार करने जंगल में गया। पूरा दिन भटकने के बावजूद भी कोई शिकार उसके हाथ नहीं लगा। परिवार के भरण-पोषण की चिंता में भटकते-भटकते वहाँ रात हो गई। फिर वो झील के किनारे के वृक्ष पर इस उम्मीद से चढ़ गया कि शायद कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने जब झील पर आएगा तो मैं उसका शिकार कर लूंगा। वो वृक्ष बिल्ववृक्ष था और उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग रखा हुआ था।

कुछ देर के इंतजार के पश्चात रात्रि के प्रथम प्रहार में झील के किनारे एक हिरणी वहां पानी पीने आई। शिकार करने के उद्देश्य से शिकारी ने बाण चलाया किंतु अंधेरे की वजह से बाण बिल्व वृक्ष की टहनियों पर लग गया और गलती से शिवलिंग पर झील का जल और बिल्ब पत्र अर्पित हो गया। इस तरह रात्रि के प्रथम प्रहर में अज्ञात तौर पर उसके द्वारा वृक्ष के नीचे रखे शिवलिंग की पूजा हो गई साथ ही पत्तों और जल गिरने की आवाज की वजह से वो हिरणी वहां से भाग गई।

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कुछ देर पश्चात रात्रि के दुसरे प्रहार में एक और जानवर वहीं उसी झील के पास पानी पीने आया जिसके साथ जिसके साथ संयोगवश पुनः वही प्रक्रिया दोबारा घटित होती है।

सौभाग्यवश यही प्रक्रिया रात्रि के चारों प्रहर में घटित होती है और उस शिकारी द्वारा रात्रि के चारों प्रहर में जागरण एवं शिव का जलाभिषेक एवं बेलपत्र से पूजा अर्चना हो जाती है जिससे उसके मन के पाप एवं जानवरों की हत्या करने की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है और उसके सभी दोष भी समाप्त हो जाते हैं। इससे भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं एवं शिवलिंग से प्रकट होकर गुरुद्रुह को वरदान देते हैं कि तुम्हें इस जन्म में मोक्ष की प्राप्ति होगी, साथ ही तुम्हारे घर त्रेतायुग में स्वयं प्रभु श्री राम आएंगे।

इस प्रकार शिवरात्रि पर्व पर विधि विधान से पूजन करने का विशेष महत्व है। विधिवत पूजा अर्चना भगवान शिव के अंतर्मन को प्रसन्न चित्त एवं आप को फलीभूत करती हैं।

शिवरात्रि तिथि एवं शुभ मुहूर्त

ज्योतिषीय पंचांग की गणना के अनुसार वर्ष 2021 में महाशिवरात्रि के व्रत का योग 11 मार्च दिन बृहस्पतिवार का है।

निशिता काल पूजन का समय- मध्यरात्रि 12 बजकर 06 मिनट (12 मार्च 00:06am) से मध्यरात्रि 12 बजकर 54 मिनट (12 मार्च 00:54am) तक
निशिता पूजन कालावधि- 47 मिनट

महा शिवरात्रि पारण वेला- 12 मार्च प्रातः 06: बजकर 34 मिनट से दोपहर 03 बजकर 01 मिनट तक

रात्रि प्रथम प्रहर पूजन का समय- शाम 06 बजकर 28 से रात 09 बजकर 28 मिनट।
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजन का समय- रात 09 बजकर 28 मिनट से मध्यरात्रि 12 बजकर 31 मिनट (12 मार्च 00:31am)।
रात्रि तृतीय प्रहर पूजन का समय-  मध्यरात्रि 12 बजकर 31 मिनट (12 मार्च 00:31am) से 12 मार्च तड़के सुबह 03 बजकर 32 मिनट।
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजन का समय- 12 मार्च तड़के सुबह 03 बजकर 32 मिनट से 12 मार्च प्रातः 06 बजकर 34 मिनट

चतुर्दशी तिथि आरम्भ- 11 मार्च 2021 दोपहर 02 बजकर 39 मिनट
चतुर्दशी तिथि समाप्ति- 12 मार्च 2021 दोपहर 03 बजकर 02 मिनट

महा शिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि

महाशिवरात्रि के व्रत को धारण करने हेतु प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में व्रती यानी व्रत करने वाले को उठकर नहाने के पश्चात (अगर संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें) माथे पर भस्म अथवा चंदन का त्रिपुंड तिलक लगाएं और फिर उसके बाद अपने गले में रुद्राक्ष की माला को धारण कर नजदीकी किसी भोले बाबा के मंदिर में जाकर शिवलिंग का अभिषेक एवं पूजा अर्चना करें। इसके बाद शिवरात्रि व्रत करने हेतु संकल्प धारण करें।

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व्रत संकल्प

सर्वप्रथम पवित्रीकरण, सिखावन्दन आदि द्वारा स्वयं का शुद्धिकरण करें। तत्पश्चात दायें हाथ में अक्षत, पुष्प (फूल), पान, सुपारी, धूप, नैवेद्य और दक्षिणा आदि रखें और निम्न मंत्र का श्रद्धा पूर्वक उच्चारण करें-

शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।

मंत्र उच्चारण समाप्त होने पर अपने हाथों के पूजन सामग्रियों को शिवलिंग पर अर्पित करते हुए नीचे लिखा श्लोक बोलें

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।

जिसके बाद मन ही मन अंतःकरण में पवित्र भाव से शारिरिक क्षमता अनुसार व्रत हेतु संकल्प धारण करें।

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