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बैसाखी

baisakhi

भारतवर्ष विविधताओं में एकता का देश है। यहां अनेकानेक धर्म जाति संप्रदाय आदि को मानने वाले लोग एक साथ मिलजुल कर रहते हैं  जिसमें हिंदू धर्म को आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता से परिपूर्ण धर्म माना जाता है। हिंदू धर्म एवं इसकी संस्कृति का डंका संपूर्ण विश्व में बोलता है। भारत की वैदिक हिंदू परंपरा के कारण ही आज इसकी कीर्ति एवं यश का संपूर्ण विश्व भर में गान होता है।

हिंदू धर्म में अनेकानेक पर्व एवं त्यौहार हैं जो हमारे हर्षोल्लास को बढ़ाने, मानसिक शांति एवं आपसी एकता व सहकार की भावना को फलीभूत करने के लिए मनाए जाते हैं।

भारतीय हिंदू कैलेंडर के हर एक महीने में भिन्न-भिन्न उत्साहवर्धक, सुख प्रदायक खुशनुमा त्यौहार है जिसमें पहला महीना चैत्र का है जो अभी-अभी गुजरा है और अब बैसाख की शुरुआत हो चुकी है। इन सभी महीनों में बैसाख का महीना तीज, त्यौहार के मामले में अपने आप में विशेष महत्व रखता है।

बैसाख के इस पावन महीने में अक्षय तृतीया, बैसाखी, भगवान परशुराम जयंती, वरुथिनी एकादशी, वैसाख अमावस्या, सीता नवमी, मोहिनी एकादशी, गंगा सप्तमी जैसे अनेकानेक त्योहार आते हैं  जिसमें बैसाखी विशेष एवं विलक्षण प्रकृति की है।

भारत के मेरुदंड यानी कृषकों के लिए यह अत्यंत ही खास होता है। इस दिन रवि फसल के कटाई पर किसान खुशी-खुशी जश्न मनाते हैं।

यह त्यौहार विशेष तौर पर पंजाब और हरियाणा में  महत्वपूर्ण  माना जाता है और काफी धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसे अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम एवं तर्कों के साथ मनाया जाता है, जैसे कि बंगाल में से पोइला कहते हैं और नववर्ष के जश्न के रूप में मनाया जाता है, जबकि वहीं असम में इसे बिहू पर्व के नाम से जाना जाता है। पंजाब, हरियाणा, यूपी आदि के क्षेत्रों में इसे बैसाख का त्यौहार कहा जाता है जबकि बिहार में सिरवा पर्व के नाम से इसे बनाया जाता है।

वैसाखी की अनेकों मान्यताएं

वैसाखी पर्व के पीछे अनेक अनेक मान्यताएं है जिसमें महाभारत ग्रंथ के अनुसार जब महाराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ 14 वर्ष के लिए अज्ञातवास को वन जाते हैं तो उसी दौरान वे पंजाब के कटराज ताल के क्षेत्रों में अज्ञातवास करते है।

एक दिन महाराज युधिष्ठिर जल हेतु एक सरोवर पर अपने छोटे भाई को भेजते हैं जिस पर सरोवर में यक्ष द्वारा उनसे कुछ प्रश्न किए जाते हैं और जिनका सही उत्तर ना दे पाने पर युधिष्ठिर के चार भाइयों की मृत्यु हो जाती है। तत्पश्चात अंत में जब वहां युधिष्ठिर पहुंचते हैं तो सरोवर यह शर्त दोबारा उनके समक्ष भी रखता है कि जब तुम मेरे सभी प्रश्नों का सही सही उत्तर दे दोगे तो मैं तुम्हें तुम्हारे चारों भाइयों जीवित कर कर दूंगा और साथ ही जल लेने के लिए भी अनुमति प्रदान करूंगा।

महाराज युधिष्ठिर सभी शर्तों को मानते हुए यक्ष के सभी प्रश्नों का सही-सही उत्तर दे देते हैं जिससे उनके चारों भाइयों के प्राण वापस आ गए। यह महीना वैशाख का था इसलिए उस दिन से इसे बैसाखी पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। इसी मान्यता के आधार पर आज भी कटराज ताल क्षेत्र में बड़े ही भव्य तौर पर मेले, पूजन, ढोल-नगाड़े आदि का आयोजन कर लोग जश्न मनाते हैं।

सिखों के लिए इस पर्व का महत्व विशेष होता है। चूँकि आज ही के दिन सिखों के दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की गई थी। वैसाखी के दिन गुरु गोविंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उस समय की परिस्थितियों के अनुसार खालसा पंथ की स्थापना का तात्कालिक कारण आम जनमानस को मुगल शासकों के अत्याचार से स्वतंत्र कराना था।

बैसाखी तिथि व राशि 2021

प्रायः बैसाखी का पर्व 13 अथवा 14 अप्रैल को देशभर में मनाया जाता है। इस वर्ष ग्रह गोचर एवं राशियों की स्थिति के अनुसार वैसाखी 14 अप्रैल 2021 दिन बुधवार को देशभर में मनाई जा रही है।

इस वर्ष बैसाखी के दिन यानी 14 अप्रैल को सूर्य तड़के सुबह 02 बजकर 48 मिनट (02:48am) से मेष राशि में संचार करेगा। इस कारण इसे ज्योतिषीय दृष्टिकोण में मेष संक्रांति भी कहा जाता है, साथ ही कुछ क्षेत्रों में इसे नववर्ष की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता है।

भारत में आज के दिन से बद्रीनाथ धाम के पट खोल दिए जाते हैं एवं आज से बद्रीनाथ धाम की यात्रा भी आरंभ होती है। किसी भी पर्व का उद्देश्य अपनों की सलामती एवं आपसी सद्भाव को बनाए रखना होता है जिसके दृष्टिकोण से परिस्थितियों के अनुकूल कार्य करना समझदारी समझी जाती है।

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क्या होता है वैसाखी पर विशेष?

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदियों का स्नान मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है। इसे आप घर बैठे भी भावनात्मक तौर पर संभव कर सकते हैं। इसके लिए आप अपने नहाने के जल में गंगाजल को मिश्रित कर भाव करें कि आप मां गंगा की गोद में विराजित है एवं उनका आशीष व ममत्व आपको प्राप्त हो रहा है।

आज के दिन स्नान कर अपने इष्ट देव की आराधना कर नवीन फसलों से बने भिन्न-भिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है एवं हर्षोल्लास के साथ एक दूसरे के साथ बैठकर छप्पन भोग का पान किया जाता है।

बिहार, झारखंड आदि क्षेत्रों में इस दिन प्रातः काल में सभी पेड़ों में जल देकर उनके फलीभूत होने की कामना की जाती है, साथ घर के बड़े-बुजुर्ग भी छोटे एवं बच्चों के मस्तक पर जल की कुछ बूंदें डाल शीतल, सौम्य एवं श्रेष्ठ सद्बुद्धि युक्त होने का आशीष प्रदान करते हैं।

कुल मिलाकर बैसाखी का पर्व हर्षोल्लास का, एकजुटता का, लहलहाते खेत की सेंधी खुशबुओं का, किसानों के चेहरे पर आई बड़ी सी मुस्कान का एवं हिंदू संस्कृति के उल्लास का अनुपम अनूठा पर्व है।

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