जाने मंत्र जप के तीन स्तंभ आसन, माला व दीप का महत्व व इनसे होने वाले फायदे

Three pillars of Japa Aasan, Mala and Deep

पुरातन काल में अनंत भक्तों ने अपने ईष्टदेव व गुरुजनों को विभिन्न प्रकार से अपनी भक्ति का बोध कराया है। जैसे कर्ण ने परशुराम के दुख को पाना बनाकर, एकलव्य के द्वारा अपने गुरु को अपने हाथ का अंगूठा भिक्षा रूप में अर्पित करना आदि रूपों में भक्तजनों ने अपनी भक्ति का बोध कराया। ठीक इसी प्रकार साधारण मानव जन तप, साधना, ध्यान आदि रूप में भगवान की वंदना कर अपनी भक्ति सहृदय अर्पित करता है। किंतु जाप, ध्यान आदि के स्थान पर मानव को अपनी प्रत्येक उपयोगी वस्तओं को सुव्यवस्थित व ध्यानपूर्वक रखना चाहिए। जाप के दौरान अपने आसन, जप की माला, दीपक आदि का उपयोग अपने ईष्ट देव के द्वारा बताई गई विधि अनुसार ही करना चाहिए क्योंकि ये तीन चीजें जप-साधना के स्तंभ रूप है। इसलिए साधक को इनका उपयोग क्रियाबद्ध होकर ही करना चाहिए।

आइए जानते हैं कौन से आसन का प्रयोग हमें पूजा के समय करना चाहिए, किस ईष्ट देव की आराधना हेतु हमें किस माला का उपयोग करना चाहिए व इष्टदेव के समक्ष किस प्रकार के दिए को प्रज्वलित करना चाहिए।

ईश्वर की आराधना हेतु आसन का महत्व

जप के दौरान साधक ईश्वर के सम्मुख बैठकर आराधना करता है जिसमे साधक की ईश्वर से भेंट होती है। इससे साधक के भीतर विशेष प्रकार की शक्तियों का संचार होता है जिसके द्वारा साधक के जीवन में ईश्वर की अनुकम्पा सदा विराजमान रहती है। जो साधक बिना आसन के या सामान्य आसन पर जप करते हैं, यह मान्यता है कि उन्हें कर्मस्वरूप फल की प्राप्ति नहीं होती व ईश्वर के माध्यम से उत्पन हुई ऊर्जा का संचार साधक के अतः कर्ण से होते हुए सीधे पृथ्वी में समाहित हो जाती है। इसलिए साधक को अपनी सुविधा अनुसार बताए गए अन्य आसनों का प्रयोग करना चाहिए।

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नवीन आसन को स्थापित कर साधक को मंत्र के माध्यम से पवित्र गंगा जल का अभिसिंचन करना चाहिए। तत्पश्चात ही अपनी पूजन विधि को आरंभ करना चाहिए। जिस स्थान पर आसीन होकर साधक ईश्वर की आराधना करता है, उसे ब्रह्म का स्थान कहा गया है। इसलिए कहा जाता है कि जो भी साधक स्नेह पूर्वक ईश्वर का स्मरण करता है, उस पर सदैव ईश्वर की अनुकम्पा विराजमान रहती है।

शास्त्रों में कई आसनों का प्रयोग जप के दौरान वर्जित है। ऐसा कहा जाता है कि गलत आसनों के प्रयोग से साधक के समक्ष अनेक समस्याएं विचरण करती है। जैसे - बिना किसी आसन के भूमि पर बैठकर जप करने से मानव में दरिद्रता का वास होता है, लकड़ी के आसान से घर में अशांति विराजमान रहती है, कपड़े से युक्त आसन से चिंता और बाधाओं जीवन निर्मित रहता है। इसी प्रकार हमें वर्जित आसनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके विपरित हमें नीचे दिए गए अन्य आसनों का प्रयोग करना चाहिए जो मानव जीवन को सुख-शांति, यश-वैभव, बुद्धि-विवेक, बल आदि से निर्मित करते हैं। इसी प्रकार विभिन्न आसनों का प्रभाव मानव पर भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए आसनों का जाप के दौरान बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।

कुश आसन- यह आसन सबसे ज्यादा लाभकारी व फलदायक माना जाता है। जप के दौरान इस आसन का उपयोग करने से मानव को यश, वैभव व आरोग्यता की प्राप्ति होती है व वह अपने लक्ष्य के प्रति सजगता, विनम्रता एवं एकाग्रता से तत्पर रहता है।

मृगचर्म आसन- इस आसन के प्रयोग से साधक को अपने द्वारा किये गए कुकृत्यों, कुकर्मों व सभी पापों से मुक्ति मिलती है व अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कम्बल आसन- जो भी साधक जीवन में कर्मशीलता की प्रधानता हेतु पूजा अर्चना करते हैं, उसे कम्बल आसन का प्रयोग करना चाहिए। यह आसन अवश्य ही लाभदायक सिद्ध होगा।

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व्याघ्रचर्म आसान- इस आसन के प्रयोग से साधक को राजसी सुखों की प्राप्ति होती है। ये अपने सभी कार्य निडरता पूर्वक पूर्ण करते हैं। इससे साधक को धन संपदा, यश, बल, बुद्धि, विवेक आदि की प्राप्ति होती है ।

मंत्र जाप की विधि

साधक को प्रातः काल उठकर सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण कर, अपने हाथों को फैलाकर उन्हें देखते हुए इस मंत्र का जाप करना चाहिए ।

कराग्रे वस लक्ष्मी

अपनी दैनिक क्रिया को सम्पूर्ण कर घर कों गंगा जल से पवित्र करें, तत्पश्चात पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित कर मंत्र का जाप करें ।

दीपो ज्योति परम ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु में पापम पूजा दीप नमोस्तुते।
शुभम करोतु कल्याण आरोग्यम सुख सम्पादम ।
शत्रु बुद्धि विनाशय पूजा दीप नमोस्तुते।

इसके पश्चात मानव को अपने दोनो नेत्रों के मध्य केंद्र में ध्यान स्थापित कर किसी भी ईश्वर को साक्षी मानकर माला का जाप करें। जाप के पूर्ण होने के उपरांत माला को पुनः ईश्वर के समक्ष रखें और ईश्वर से यह प्रार्थना करें कि जप के दौरान कोई भी त्रुटि ही गई हो, तो उसके लिए क्षमा याचना हेतु मंत्र जाप करना चाहिए।

ॐ गुह्याती त्वम ग्रहानास्मकृत जपम ।
सिद्धिर्भवतु में देवत्व प्रसदानमहेश्वरः।

इस मंत्र का स्मरण करने के उपरांत शांति पाठ करें व ईश्वर के चरण स्पर्श कर प्रणाम करें।

ईश्वर के समक्ष दीपक की महत्ता

ईश्वर के समक्ष विभिन्न रुप में दीपक प्रज्वलित करने का प्रचलन है। साधक की ग्रहों की शांति हेतु देशी घी का दीपक जलाना चाहिए, शनि देव की आराधना हेतु सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए व माँ भगवती की आराधना के लिए तिल के तेल के दिए जलाना चाहिए। इसी प्रकार साधक को ईश्वर की आराधना हेतु विभिन्न देवताओं के समक्ष भिन्न-भिन्न रूप के दीप प्रज्वलित करने चाहिए।

माला की महत्ता

साधक को ईश्वर की आराधना हेतु मंत्र जाप के लिए किस माला का उपयोग करना चाहिए, इसका भी भारतीय संस्कृति में अधिक महत्व है। मान्यता है कि शिव जी के लिए रुद्राक्ष की माला, विष्णु जी के लिए तुलसी की माला, माँ दुर्गा की आराधना हेतु चंदन की माला व इसी प्रकार वैजयंती माला का प्रयोग साधक को देवी माँ लक्ष्मी जी की आराधना हेतु करना चाहिए।



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