सर्वपितृ अमावस्या

sarvapitra amavasya

हिंदू धर्म में अनेकानेक प्रकार के व्रत, पूजा, पर्व, त्योहार, कर्म , संस्कार आदि माने गए हैं जो साल के बारहों मास लगातार बने रहते हैं जिस वजह से हिंदू धर्म में साल के बारहों मास को अत्यंत ही खास एवं किसी न किसी विशेष तत्वों से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे ही अश्विन मास को वर्ष के अन्य सभी 11 माह से में से खास माना जाता है।

अश्विन मास के अनेकानेक प्रकार के व्रत-त्योहार  के मध्य अमावस्या की तिथि को अत्यंत ही महत्वकारी माना गया है। अमावस्या की तिथि के पीछे के महत्व के संबंध में पितृपक्ष को कारण माना जाता है, अर्थात अश्विन मास में पड़ने वाली अमावस्या की तिथि पितृ पक्ष की अमावस्या होती है। इस वर्ष पितृ पक्ष के अमावस्या की तिथि अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक17 सितंबर की पड़ रही है जो गुरुवार के दिन हैं।

तो चलिए सर्वप्रथम जानते हैं कि पितृपक्ष का अमावस्या से क्या संबंध है अथवा पितृपक्ष या सर्वपितृ अमावस्या का तात्पर्य क्या है?

सर्वपितृ अमावस्या अथवा पितृपक्ष  का महत्व

पितृ पक्ष अथवा सर्वपितृ अमावस्या तर्पण आदि के संबंध में अगर हम ज्योतिष शास्त्रों का अवलोकन करें तो ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक पितृ पक्ष का आरंभ हर वर्ष भाद्र मास की पूर्णिमा तिथि से ही हो जाता है, साथ ही अश्विनी मास के प्रथम पक्ष यानी प्रथम पखवाड़े, जो कि माह का कृष्ण पक्ष होता है, को पितृपक्ष के रूप में माना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र व हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक इस काल अवधि के दौरान सभी जातक अपने दिवंगत पूर्वजों व पितरों का स्मरण कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करते हैं एवं उनके लिए स्नान, दान, तर्पण आदि की संपूर्ण प्रक्रिया को अपनाते हैं। इस दौरान जातक अपनी ओर से अपने पितरों अर्थात अपने पूर्वजों के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करते हैं। इस वजह से इसे श्राद्ध कर्म कहकर भी संबोधित किया जाता है।

शास्त्रों में ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष की उसी तिथि को अपने पितरों का तर्पण अथवा श्राद्ध कर्म करना चाहिए, जिस तिथि को उसके पितरों की मृत्यु हुई है। अर्थात जिस तिथि को किसी भी जातक के पूर्वज इस संसार को छोड़कर गए थे, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के उसी तिथि को जातकों को अपने पूर्वजों के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करते हुए तर्पण की प्रक्रिया को पूर्ण करना चाहिए ।

किंतु तत्कालीन समय की भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी भी जातक के लिए यह अत्यंत ही कठिन है कि वह अपने सभी पूर्वजों के मृत्यु की तिथि को ही अश्विन मास में श्राद्ध के कर्म को पूर्ण करें, साथ ही सभी पितरों के लिए अलग-अलग तिथि को तर्पण की क्रिया को पूर्ण करना भी अत्यंत ही कठिनाइयों से भरा है।

प्रायः तो ऐसा देखा गया है कि जातकों को अपने पितरों अर्थात पूर्वजों के देहावसान की तिथि याद नहीं होती, ऐसे में ज्योतिष शास्त्री व धर्म शास्त्रों के अन्य विशेषज्ञ जातको की सुविधा हेतु एक समाधान निकालते हुए यह तय करते हैं कि कोई भी जातक अपनी सुविधा अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की किसी भी तिथि को अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करते हुए श्राद्ध का कर्म पूर्ण कर सकता है, साथ ही अलग-अलग पितरों के तर्पण की जगह किसी एक तिथि को ही सभी पितरों का एक साथ तर्पण भी किया जा सकता है। हालांकि सभी पितरों के एक साथ तर्पण करने की तिथि को लेकर अश्विन मास के अमावस्या की तिथि को अत्यंत ही महत्वकारी माना गया है। इस दिन कोई भी जातक अपने सभी पूर्वजों का एक साथ तर्पण कर सकते है। इस कारण से ही अश्विन मास की अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कह कर भी सम्बोधित किया जाता है।

पितृ अमावस्या अथवा सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

पितृ अमावस्या अथवा सर्वपितृ अमावस्या के संबंध में यह मान्यता है कि इस दिन सभी जातकों के पितृ अर्थात उनके पूर्वज उनके द्वार पर अपने स्वजनों से स्वयं के लिए श्रद्धा भावना ग्रहण करने आते हैं। वहीं यदि जातक अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट नहीं करते हैं, तो उनके पूर्वज उनसे कुपित हो जाते हैं एवं अपने ही स्वजनों के प्रति अपने कुविचार अर्थात दुर्भावना को मन में पाल लेते हैं जिस वजह से वे उन्हें शाप देकर चले जाते हैं जिसका जातकों के ऊपर बहुत ही बुरा असर पड़ता है एवं उनके जीवन में अनेकानेक प्रकार के दोष आदि मंडराने लगते हैं। पितरों के तिरस्कार से जातकों के ऊपर पितृ दोष लगता है जो अत्यंत ही दुष्प्रभावी  माना जाता है ।

इसी वजह से जातक पितृ दोष निवारण के उपाय में हर वर्ष आश्विन मास की अमावस्या की तिथि को अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करते हुए सर्वपितृ अमावस्या के द्वारा अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। ऐसा करने से पितरों अर्थात जातकों के पूर्वजों के मन को शांति पहुंचती है, साथ ही उनके पित्र प्रसन्न होकर अपने स्वजनों के प्रति अपनी कृपा दृष्टि बरसाते हैं जिससे आपके घर परिवार व जीवन में सदा खुशहाली बरकरार रहती है। इसके अतिरिक्त पितृ के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करने से सभी जातकों के पितर अर्थात उनके पूर्वज अपने स्वजनों की आजीवन हर प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक वैसे तो हर मास की अमावस्या की तिथि को पिंडदान अथवा तर्पण हेतु अत्यंत ही उपयुक्त माना जाता है, किंतु अश्विन मास की अमावस्या की तिथि को तर्पण हेतु अत्यंत ही उपयुक्त एवं शुभकारी माना जाता है। इस दिन जातकों द्वारा अपने पूर्वजों के प्रति प्रकट की गई श्रद्धा भावना से उनके पूर्वजों को आत्मिक तृप्ति व सुख शांति की प्राप्ति होती है।

पितृ अमावस्या पूजन हेतु श्राद्ध कर्म की सम्पूर्ण विधि

ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक सर्वपितृ अमावस्या की तिथि को सभी जातकों को किसी पवित्र नदी में स्नान कर गायत्री मंत्रों का जप करना चाहिए, साथ ही सूर्य गायत्री अथवा सूर्य मंत्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए। तत्पश्चात श्राद्ध कर्म हेतु तैयार किए गए व्यंजनों, भोजनों को पंचबलि अर्थात पांच प्रकार के जीव गाय, कुत्ते, कौवे, देव एवं चींटियों के लिए भोजन का अंश निकाल कर उन्हें प्रदान करना चाहिए। इस प्रक्रिया को संपन्न करने के पश्चात सभी जातकों को श्रद्धा भावना प्रकट करते हुए अपने पूर्वजों के लिए मंगल कामना करनी चाहिए, साथ ही उनकी आत्मा की शांति हेतु ईश्वर से आराधना करनी चाहिए। इस दिन दान करने का विशेष महत्व माना जाता है। तो किसी गरीब जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन प्रदान करना चाहिए, साथ ही दान-दक्षिणा आदि भी देनी चाहिए। सर्वपितृ अमावस्या की पूजन में ब्राह्मणों को भोजन करवाना एवं दान देना भी उपयुक्त माना जाता है, अतः आप इस प्रक्रिया को भी अपनाएं अन्यथा जरूरतमंद लोगों में ही दान, भोजन आदि की क्रिया को संपन्न कर ले।

इस दिन संध्या कालीन बेला में जातकों को अपनी क्षमता के अनुरूप पांच दीपक अथवा अपने पितरों  के लिए एक एक दीपक जलाकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट करनी चाहिए।

सर्वपितृ अमावस्या तिथि एवं श्राद्ध कर्म हेतु शुभ मुहूर्त

हिंदू कैलेंडर के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या इस वर्ष की तिथि 17 सितंबर 2020 की निर्धारित है। इस दिन गुरुवार है जिसमें अमावस्या का आरंभ 1 दिन पूर्व की तिथि अर्थात 16 सितंबर को ही संध्या 7 बजकर 53 मिनट पर हो जाएगा। वहीं अमावस्या तिथि का समापन दूसरे दिन अर्थात 17 सितंबर की शाम 4 बजकर 32 मिनट का है। इसी मध्य कुछ ऐसे मुहूर्त है जिसमें सर्वपितृ अमावस्या का पूजन कर्म अथवा श्राद्ध कर्म आदि की क्रिया को संपन्न किया जाएगा। कुछ शुभ मुहूर्त के नाम व समय नीचे दिए जा रहे हैं:-

कुतुप मुहूर्त: 11 बजकर 51 से 12 बजकर 40 मिनट।
रौहिण मुहूर्त: 12 बजकर 40 मिनट से 01 बजकर 29 मिनट।
अपराह्न काल: 01 बजकर 29 से 03 बजकर 56 मिनट ।

अमावस्या तिथि आरंभ: शाम 7 बजकर 53 मिनट (16 सितंबर 2020) से
अमावस्या तिथि समाप्त: शाम 04 बजकर 32 बजकर (17 सितंबर 2020) तक।



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