कबीर जयंती (Kabir Jayanti)

Kabir Jayanti

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

संत कबीर द्वारा रचित दोहा उन पर ही बिल्कुल सटीक बैठता है। वे एक ऐसे महान संत हुए, जिनके दिव्य अलौकिक ज्ञान का डंका आज भी संसार भर में बजता है। कबीर का चरित्र जात-पात, धर्म, जेहाद आदि से परे था। उन्हें सांसारिक प्राणियों से कोई मोह नहीं था। वे एक निर्मल एवं पवित्र आत्मा थे। वे भौतिक सुख-सुविधाओं पर कभी आकर्षित नहीं हुए। संत कबीर ईश्वर से सदैव इतना ही मांगते थे कि-

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए।।

अर्थात हे, ब्रह्म मुझे इतने संसाधन दीजिए जिसमें मेरे अपने कुटुंब यानि मेहमानों की पूर्ति हो जाए, साथ ही मैं भी भूखा ना रहूं और कभी ऐसे दिन ना आए जीवन में कि किसी साधु को मेरे द्वार से भूखा जाना पड़े।

जन्म

ऐसे पवित्र और श्रेष्ठ विचार के संत के जन्म को लेकर अनेकों तथ्य प्रचलित है। किंतु इनके जन्म तिथि के संबंध में यह मान्य है कि इनका जन्म हिंदू कैलेंडर के विक्रम संवत 1455 में हुआ था। जिस दिन इनका जन्म हुआ था, वह जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी। तब से इस तिथि को उनके जन्मदिन के रूप में जाना जाने लगा और लोग इस तिथि को कबीर जयंती के रूप में मनाने लगे।

वैसे तो संत कबीर सर्वत्र ही प्रचलित एवं देव तुल्य हैं जिस कारण अनेकों लोग संत कबीर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कबीर जयंती मनाते हैं एवं उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने का निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं। किंतु यह तिथि कबीरपंथियों के लिए विशेष महत्व रखती है। इसलिए वे इसे उत्सव एवं उल्लास के त्योहार के रूप में मनाते हैं। दरअसल संत कबीर जात-पात, धर्म-रिवाज आदि से परे थे। जीवन के प्रति उनका अलग ही दृष्टिकोण हुआ करता था। उनकी नियमावली, विचार सभी अनोखे थे जिसे अपनाने हेतु सभी का मन मोहित हो जाया करता था। फलस्वरुप संत कबीर की विचारधारा को अनेकों लोगों ने अपने जीवन में समाहित किया। इन्ही सब के दौरान एक अलग समुदाय 'कबीर को मानने वाले विचारों' का निर्मित हुआ जिसे कबीरपंथी कहा जाने लगा।

कबीर जयंती 2020

इस वर्ष 2020 में जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तिथि 5 जून की पड़ रही है। अतः इस दिन कबीर जयंती मनाई जाएगी। इस वर्ष 5 जून को कबीर जयंती के अतिरिक्त मासिक वट सावित्री व्रत भी मनाया जाएगा। साथ ही ज्येष्ठ पूर्णिमा पर स्नान-दान का भी विधान है।

कबीर जयंती को कबीरपंथियों द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन वे अपने जीवन में कबीर के चरित्र को धारण करने हेतु संकल्पित होते हैं एवं अधिक से अधिक जनकल्याण करने का बीड़ा उठाते हैं। आज वे संत कबीर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तथा उनके द्वारा रचित लेखों का गुणगान करते हैं। संत कबीर की दृष्टि में ईश्वर मात्र एक है जिसे वे अपनी भाषा में कभी ब्रह्म तो कभी साईं कहकर संबोधित करते हैं। उन्होंने ईश्वर को धार्मिक तथा जातियों के बंधन से परे माना। वे अपने लेखनी में इसको राम, हरि आदि कहकर भी संबोधित किया करते थे।

संत कबीर के विषय में ये भी जानें-

कबीर एक स्वच्छंद विचार के विचारक थे जो अपनी बातों को बेबाक तरीके से समाज के सामने रखकर सत्यता का भान कराने का कार्य करते थे। संत कबीर पूजा-पाठ, शोर-शराबा, ढ़ोंग, दिखावा आदि में बिल्कुल भी यकीन नहीं रखते थे। वे सदैव इनके विरुद्ध रहे। उनकी दृष्टि में ईश्वर केवल एक हैं। वे सदैव निर्गुन ब्रह्म के उपासक रहें जिन्हें आत्मा से ही पूजित किया जा सकता है। उन्होंने समाज को सदैव जागृत किया है। उनकी लेखनी आज भी जन-जन तक संदेश पहुंचाने का कार्य कर रही है।

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प्रायः लोगों के मन में संत कबीर के ज्ञान के स्रोत अर्थात गुरु, गुरुकुल आदि के संबंध में प्रश्न उठता है। साथ ही लोग यह भी जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा रचित कृतियां किस प्रकार संग्रहित की गई। वे आज भी कैसे विद्यमान है।

दरअसल यह माना जाता है कि संत कबीर का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था किंतु उनका लालन-पालन चंद वर्षों तक एक निम्न जाति के हिंदू परिवार में हुआ था। कुछ दिनों बाद वे एक गुरुकुल में अति ज्ञानवान एवं प्रचलित ऋषि के समीप सेवाशुश्रूषा का कार्य करने लगें। वहीं वे सेवाश्रम, सेवादान आदि का कार्य करने लगे। वहाँ वे गुरु द्वारा शिष्यों को दिए जा रहे हैं ज्ञान से प्रेरित हुए एवं जन-जन तक अपने विचारों को पहुंचाने हेतु तत्पर हो गए। उनकी तत्परता एवं जागरूकता को देखते हुए गुरु ने उन्हें सेवा सुश्रुषा के कार्यों से मुक्ति देकर अपने शिष्य के रूप में वरण करने का निर्णय लिया। तत्पश्चात उन्होंने अपने लग्न एवं जतन के साथ खूब अध्ययन किया एवं उन्होंने अपने विचारों को समाज तक पहुंचाने एवं जन जागरण हेतु सरल से सरल शब्दों का प्रयोग किया, ताकि अधिक से अधिक लोग सामान्य भाषा में उसे पढ़-समझकर उसे अपने जीवन में समाहित कर सकें।

एक बार की बात है। उनके लेखन शैली के लोकभाषी होने पर किसी अन्य शिष्य ने प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए यह कहा कि गुरुदेव यह बालक दास योग ही है। इनकी लेखन शैली विद्वानों वाली नहीं है। तत्पश्चात संत कबीर से गुरुदेव द्वारा इस संबंध में प्रश्न पूछे जाने पर उन्होंने यह उत्तर दिया कि वे लोगों की भावनाओं से जुड़कर उनकी अंतरात्मा को जागृत करना चाहते हैं एवं लोगों की भावनाओं एवं संवेदना हो तक पहुंचने हेतु उनकी भाषा का प्रयोग ही सर्वोत्तम है। इस कारण वे बोलचाल की सामान्य भाषा का प्रयोग करते हैं जो सामान्यतः सरलता पूर्वक कोई भी समझ ले। उनके इस विचार को जानकर गुरुदेव अति प्रसन्न हुए एवं आशीष दिया कि एक दिन तुम संसार भर में प्रचलित होगे एवं तुम्हारी द्वारा रचित कृतियां-दोहे ना सिर्फ साहित्य जगत, अपितु जीवन दर्शन का प्रतिबिंब साबित होंगी।  

कबीर दास जी द्वारा शरीर का त्याग करने के पश्चात हिंदू-मुस्लिम, सभी धर्म के लोगों में वाद-विवाद आरंभ हो गया कि कबीर हिंदू थे इसलिए वे उनके दाह संस्कार के अधिकारी हैं। तो मुस्लिमों का यह मानना था कि कबीर मुस्लिम थे, इसलिए उनके दफन आदि की क्रियाकलाप के वे अधिकारी हैं। कबीर के विचारों एवं तथ्यों की इतनी लोक प्रसिद्धि थी कि लोग धर्म, जात-पात, मोह-माया सबसे परे होकर उन में लीन हो जाया करते थे। उनके दोहे, उनकी रचित कविताएं लोगों को भावनाओं से जोड़कर परम ब्रह्म परमात्मा की ओर ले जाने का कार्य करते थी।

संत कबीर के शरीर के त्याग करने के पश्चात उनकी रचनाओं को उनके शिष्यों ने संग्रह किया जिसका नाम बीजक रखा गया। बीजक को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है, सबद, साखी और रमैनी। हालांकि कुछ समय पश्चात इसे कबीर ग्रंथावली के नाम से एकीकृत कर संग्रहित कर दिया गया। कबीर संपूर्ण राष्ट्र भर के लोगों को अपनी लेखनी से जोड़ना चाहते थे। उनकी लेखनी में अनेकों भाषाएं शब्दशः प्रतीत होती थी, जैसे कि ब्रज, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी, फारसी आदि ऐसे कई भाषाएं थी जिनके शब्दों का मेल उनकी रचनाओं में दृश्य मान होता है।